रविवार, 11 फ़रवरी 2018

भारतीय सिनेमा में स्त्री

जयदीप कुमार
दिल्ली विश्वविद्यालय

भारतीय सिनेमा की शुरुआत 1896 में हुई । भारत में प्रथम स्वदेश निर्मित फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनने का श्रेय श्री गोविन्द फाल्के उर्फ़ या दादा साहब फाल्के को जाता है । दादा साहब फाल्के ने अपने लन्दन प्रवास के दौरान एक चलचित्र देखा जो ईसा मसीह के जीवन पर आधारित था । जिससे दादा साहब फाल्के को भी पौराणिक कथाओं पर चलचित्र निर्माण करने की इच्छा जागृत हुयी और इसलिए  स्वदेश आकर उन्होंने राजा हरिश्चंद्र नामक फिल्म का निर्माण किया, जो 03 मई 1913 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुआ ।

वर्ष 1931 में पहली बोलती फिल्म “आलम आरा” बनी. वर्ष 1931 में भारत में सिनेमा के क्षेत्र में स्त्री की स्थिति अच्छी नहीं थी । कोई भी स्त्री सिनेमा जैसे कलात्मक, मनोरंजनात्मक विधा में आने और अपनी प्रतिभा दिखाने को तैयार नहीं थी ।

दादा साहब फाल्के ने वर्ष 1913 में ही फिल्म मोहिनी भस्मासुर का निर्माण किया, जिसमे कमला गोखले और उनकी माँ दुर्गा गोखले ने अभिनय किया और इनको भारतीय फिल्म जगत की पहली महिला अभिनेत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ ।

दुर्गा गोखले का फिल्मों में आना कोई पारिवारिक स्वीकृति या अभिनय की इच्छा न होते हुए एक  विवशता थी. अपने पति से अलगाव की स्थिति में उनके पास तीन ही विकल्प थे. पहला विकल्प: किसी के घर में काम करना. दूसरा- वेश्यावृति का काम करना, तीसरा- फिल्मों में अभिनय करना । तीनों ही समाज की दृष्टि से निंदनीय थे लेकिन दुर्गा गोखले ने अपने और अपनी पुत्री के जीवन यापन के लिए ये रास्ता चुना और सिनेमा में एक नयी क्रांति की शुरुआत हुई ।

इस प्रकार फिल्मों में स्त्री का आगमन हुआ और इसी वर्ष 1926 में प्रदर्शित फिल्म बुलबुले परिस्तान पहली फिल्म में रूप में दिखी थी जिसका निर्देशन एक महिला बेगम फातिमा सुलतान ने किया ।

आज सिनेमा में स्त्री की स्थिति बदल गयी है फिल्मों में नायिका बनने की होड़ लग गयी है और अच्छे से अच्छे परिवार से लड़कियां फिल्मों में आ रही है ।

भारतीय समाज में व्याप्त नारी जीवन की विडम्बनाओं को लेकर फ़िल्में बनी जिसमें दुनिया ना माने (1937), अछूत कन्या (1936), बाल योगिनी (1936) आदि नारी जीवन की समस्याओं खासकर बाल विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा को उजागर करते देखे गए जो उस समय समाज में विकृति के रूप में हावी थे ।

वर्ष 1933 में फिल्म कर्मा में नायिका देविका रानी ने ऐसा बोल्ड दृश्य अभिनीत किया जो समाज के अनुरूप अच्छा नहीं माना गया था परन्तु उस समय नायिका देविका रानी ने ही अपनी प्रतिभा लोगों के सामने प्रस्तुत किया इसके लिए उन्हें इस पर तारीफ भी मिली और लोगों से आलोचना भी ।

निर्देशक महबूब खान की फिल्म “मदर इंडिया” में एक महिला के संघर्षशील जीवन को बारीकी से दिखाया गया है । वह विपरीत हालातों में भी हिम्मत नहीं हारती और बड़े ही सादगी के साथ अपने बच्चों की परवरिश करती है ।

फिल्म 1960 में आयी “मुग़ल- ए- आजम” जिसमें अपने प्यार के लिए नायिका अपने आपको बलिदान कर देने की मजबूत इच्छाशक्ति रखती है ।

भारतीय हिन्दी फिल्मों में महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकते. हमें बहुत से फिल्मों में नारी शक्ति का अद्भुत देखने को मिलता है. जैसे- देवदास, साहब बीवी और गुलाम, अंकुर, मासून, परिणीता, चक दे इंडिया आदि फिल्मों में महिलाओं की भूमिका उल्लेखनीय है ।

आज हिन्दी सिनेमा में नायिकाएं अपनी प्रतिभा लेकर इस प्रकार अपनी छाप लोगों के ऊपर छोड़कर आगे बढ़ते हुए देखी जा सकती हैं ।

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