सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

न जाने किधर - कविता

नीरज सिंह
दिल्ली विश्वविद्यालय

अब हम दूर होने लगे हैं !
न जाने किधर खोने लगे हैं ?

न सुबह का ख्याल हैं !
न शाम की पहल हैं ?

न अपनो का साथ हैं !
न गैरों का प्यार है ?

न बातों की रातें हैं !
न प्यासे नैना हैं ?

न कुछ बात रही अब दिल में !
न कुछ सपनें आते इस मन में ?

न तुम रही !
न यादें अब तुम्हारी ?

अब हम दूर होने लगें हैं !
न जाने किधर खोने लगें हैं !
न जाने किधर ...... ?

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