रविवार, 11 फ़रवरी 2018


कुमुद सिंह

हाउसवाइफ....सुनने में कितना साधारण लगता है ना ये शब्द और सुनने में ही क्यों..काफी लोग बल्कि पूरे पुरुष समाज में इसे साधारण ही समझा जाता है बल्कि साधारण भी नही अति साधारण।
हँसी आती है पुरुषों को यह कहते सुनकर की अरे तुम दिनभर करती ही क्या हो,घर पर ही तो रहना है आराम से।
हा हा हा..आराम से!यह शब्द सुनकर गुस्सा नही आता है बल्कि ऐसे सोच वाले लोगो पर दया आती है कि अभी तक किसी की सोच शिशु के भाँति ही है थोड़ा भी विकास नही हुआ। सच मे काफी दयनीय स्तिथि है पुरूषों की समाज मे।
कुछ दिनों से मैं सपना चमड़िया की एक किताब 'रोज वाली स्त्री' पढ़ रही हूँ।उसमें उन्होंने एक हाउसवाइफ के पूरे जीवन को बखूबी शब्दो मे उतार दिया है पर सवाल यह है कि क्या यह मालिको की कथित समाज मे बेगार हाउसवाइफ की कठिन और दूसरो के लिए समर्पित ज़िन्दगी को समझने हेतु विकसित मानसिकता है??
नहीं... वो तो अभी शिशु है..विकास आने में तो अभी काफी समय है..
#शिशु

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